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अमेरिका से तनाव के बीच चीन के भारत के क़रीब आने की ये हो सकती हैं वजहें

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Getty Images चीन के तियानजिन में 31 अगस्त से शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक शुरू हो रही है

भारत और चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले दो देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्थाएं दुनिया की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं.

अगर सालों बाद दोनों देशों का शीर्ष नेतृत्व किसी बड़े मंच पर मिलता है तो इससे कूटनीतिक जगत में हलचल पैदा होना तय है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 31 अगस्त से चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में होंगे.

साल 2020 में हुए गलवान संघर्ष के बाद पीएम मोदी का यह पहला चीन दौरा है. इससे पहले वह 2018 में चीन की यात्रा पर गए थे.

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वैसे तो पिछले साल अक्तूबर में रूस के कज़ान में मोदी की मुलाक़ात शी से हुई थी लेकिन तब परिस्थितियां अलग थीं.

आज भारत अमेरिका के 50 फ़ीसदी टैरिफ़ का सामना कर रहा है और इसलिए भी मोदी और शी की मुलाक़ात की अहमियत बढ़ गई है.

लेकिन ध्यान देने वाली बात यह भी है कि मई में जब भारत और पाकिस्तान आमने-सामने थे तो चीन का झुकाव स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की तरफ़ था. ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं.

क्या भारत और चीन वास्तव में क़रीब आ सकते हैं? क्या भारत चीन पर भरोसा कर सकता है? चीन में इस यात्रा को कैसे देखा जा रहा है? क्या चीन इस स्थिति का किसी तरह फ़ायदा उठा सकता है?

बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सवालों पर चर्चा की.

इन सवालों पर चर्चा के लिए ओपी जिंदल विश्वविद्यालय में चाइना स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर श्रीपर्णा पाठक, चीन में रह चुके और वहां के विषयों को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ला शामिल हुए.

क्या भारत और चीन वास्तव में क़रीब आ सकते हैं?

पीएम मोदी का दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब लद्दाख़ में अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति बहाल नहीं हो पाई है. चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. पिछले साल चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार क़रीब 127.7 अरब डॉलर था .

इसके अलावा भारतीय इंडस्ट्री की निर्भरता चीन पर बढ़ रही है. भारत ने साल 2024 में चीन से 48 अरब डॉलर की क़ीमत के इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल उपकरण आयात किए थे.

इन आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए क्या सिर्फ़ अमेरिका की वजह से भारत और चीन नज़दीक आ सकते हैं?

इस पर प्रोफ़ेसर श्रीपर्णा पाठक कहती हैं, "ये (भारत और चीन) क़रीब नहीं आ सकते हैं. हमारे यहां कहावत है कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, उसी तरह चीन में कहावत है कि एक पहाड़ में दो शेर नहीं हो सकते."

"आर्थिक नज़रिए से चीन काफ़ी सक्षम है. वह कभी नहीं चाहेगा कि एक संभावित शेर (भारत) सामने आए. उसके लिए सबसे अच्छा विकल्प है कि भारत को दक्षिण एशिया के अंदर तक सीमित रखे इसलिए चीन पाकिस्तान को सपोर्ट करता है. भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और बाज़ार भी काफ़ी बड़ा है. चीन की नज़र इस बाज़ार पर है."

भारत की आज़ादी (1947) के बाद भारत-चीन संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं. भारत चीन में साम्यवादी सरकार को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में से एक था. दोनों देशों के बीच मित्रता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना थी.

1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया जिससे भारत की चिंताएं बढ़ गई थीं. 1950 के दशक में भारत और चीन ने पंचशील सिद्धांतों पर आधारित एक समझौता किया और नारा चला- 'हिंदी-चीनी भाई-भाई.'

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फिर 1962 का युद्ध हुआ और दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी तनावपूर्ण हो गए. 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की लेकिन क़रीब तीन दशक बाद सीमा पर झड़प के कारण दोनों देशों के बीच तल्ख़ी आ गई थी.

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ला का कहना है कि दुनिया का कोई भी देश किसी और देश पर भरोसा नहीं कर सकता है.

रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ला का कहना है, "हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि चीन भारत के हित में काम करेगा या नहीं. भारत को बस यह सोचना चाहिए कि उसे अपनी बेहतरी के लिए क़दम उठाने हैं और चीन को अपनी बेहतरी के लिए. भारत अगर यह सोच रहा है कि चीन उसके क़रीब आ जाएगा और उसके हित में काम करेगा तो यह भारत की बहुत बड़ी ग़लती होगी."

चीन में पीएम मोदी की यात्रा को कैसे देखा जा रहा है?

मोदी की यात्रा से पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत आए थे. उनकी इस यात्रा को व्यापार के तौर पर चीन की मोदी यात्रा से जोड़कर देखा गया था.

चीनी मीडिया इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि चीन और भारत का मेल-जोल वैश्विक परिस्थितियों से निपटने के लिए अहम है. लेकिन असल में वहां कैसा माहौल है?

वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता बताते हैं, "चीन में इस यात्रा को मुख्यत: डोनाल्ड ट्रंप और पुतिन के परिपेक्ष्य में देखा जा रहा है. चीन के नज़रिए से दो फ़ैक्टर अहम हैं. पहला- चीन की कमज़ोर आर्थिक हालत और दूसरा- चीन के अंदर शी जिनपिंग की इमेज. अगर ऐसा मैसेज गया कि ट्रंप ने शी को कमज़ोर कर दिया है तो चीन में यह गवारा नहीं है. शी जिनपिंग की छवि सही रखने के लिए चीन को भारत की ज़रूरत है क्योंकि दोनों ही ट्रंप के टैरिफ़ का सामना कर रहे हैं."

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से पहले भारत और अमेरिका के बीच संबंध अच्छे थे. अब ट्रंप ने इन संबंधों में टैरिफ़ की दीवार खड़ी कर दी है तो क्या अमेरिकी नीति विफल हुई है? और अमेरिका भारत से क्या हासिल करना चाहता था?

प्रोफ़ेसर श्रीपर्णा पाठक बताती हैं, "अमेरिका कभी किसी का सगा नहीं रहा है. ट्रंप ने भारतीय मूल के लोगों का वोट ले लिया और अब चीन को चुनौती देने के लिए अजीबोगरीब फ़ैसले ले रहे हैं. अमेरिका को भारत से फ़ायदा था कि वो भारत के बहाने साउथ एशिया पर अपनी पकड़ मज़बूत करे."

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भारत-चीन के बीच विवाद और चुनौतियां image BBC

भारत और चीन तीन हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा साझा करते हैं जो अब तक स्पष्ट नहीं है. दोनों देशों के बीच ब्रह्मपुत्र नदी को लेकर पानी का विवाद है.

भारत लंबे समय से 'सीमा पार आतंकवाद' के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराता रहा है, जबकि चीन पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद देता है. यह भारत के लिए चिंता का बड़ा कारण है, हालांकि पाकिस्तान भारत के आरोपों को नकारता आया है.

इसी कड़ी में चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) भी विवाद का विषय है.

एससीओ में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ भी मौजूद होंगे. तो ये मुद्दे भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती रहेंगे?

सैबल दासगुप्ता का कहना है, "हाल ही में पाकिस्तान ने जितनी तवज्जो ट्रंप को दी है, उतनी उन्होंने शी जिनपिंग को कभी नहीं दी है. जबकि चीन ने 2013 से लेकर अब तक क़रीब 60 बिलियन डॉलर का निवेश किया है लेकिन जनरल मुनीर ट्रंप को सिर पर बिठाए रखे हैं. इससे चीन को चिंता होना लाज़िमी है."

"अब चीन भी सोच रहा है कि पाकिस्तान पर किस हद तक भरोसा किया जा सकता है. तमाम विवाद के बीच भारत को यह देखना ज़रूरी है कि उसे कहां फ़ायदा हो सकता है और कहां नुक़सान."

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क्या सीमा पर तनाव कम करने के लिए भारत और पाकिस्तान कुछ क़दम उठा सकते हैं?

इस सवाल के जवाब में रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ला कहते हैं, "सीमा को लेकर कुछ क़दम तो पहले उठाए जा चुके हैं. जो हालात 2020 या 2021 में थे तो उसके मुक़ाबले काफ़ी बेहतर स्थिति है."

"चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अमेरिका को छोड़कर सीधे बातचीत करे और इस शर्त पर चीन भारत से बॉर्डर पर सैनिक हटाने या नहीं हटाने को लेकर बातचीत करेगा. चीन यह संदेश नहीं देना चाहता कि वह अमेरिका के दबाव में सीमा पर पीछे हटेगा."

रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ला का कहना है कि भारत को सोच-समझकर विदेश नीति बनानी होगी क्योंकि इसके केंद्र में चीन के अलावा रूस और अमेरिका भी होने चाहिए.

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अमेरिका, चीन और भारत- अगर इसे एक ट्रायंगल के रूप में देखें तो आने वाले समय में इनका क्या भविष्य होगा?

सैबल दासगुप्ता बताते हैं, "यहां हमें तीन देशों की बजाय तीन नेताओं के बारे में सोचना चाहिए. उदाहरण के लिए पीएम मोदी एससीओ में जा रहे हैं. भारत में यह देखा जाएगा कि वो क्या लेकर आते हैं. जब मैं चीन में था तो चीन की जनता चाहती थी कि भारत से दवाइयां आयात की जाएं. लेकिन ज़िद के चलते चीनी सरकार ने बड़े पैमाने पर इसकी परमिशन नहीं दी."

"कुल मिलाकर अगर चीन को भारत से रिश्ता बढ़ाना है तो सीमा के अलावा कुछ और आश्वासन देने होंगे. तीनों देशों को एक दूसरे को कैसे सपोर्ट करना है इस पर उन्हें एक आम समझ बनानी होगी. एकतरफ़ा कुछ नहीं होना चाहिए. भारत आज पूरी तरह से चीन और अमेरिका पर निर्भर है और इस दायरे में एक बेहतर विदेश नीति बनाना कठिन है."

चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत है. भारतीय उद्योगों को अब भी कई क्षेत्रों में चीनी कच्चे माल पर निर्भर रहना पड़ता है और चीन में सस्ते उत्पादों के कारण भारत के खुदरा बाज़ार में उनकी मांग बनी हुई है.

140 करोड़ की आबादी के साथ चीन के लिए भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार है. भारतीय आईटी और फ़ार्मा सेक्टर में अच्छा काम कर रहे हैं.

ऐसे में आज के समय में भारत और चीन में किसको किसकी ज़्यादा ज़रूरत है? प्रोफ़ेसर श्रीपर्णा पाठक का कहना है कि इस वक़्त चीन को भारत की ज़्यादा ज़रूरत है.

इसके पीछे की वजह बताते हुए प्रोफ़ेसर पाठक कहती हैं, "चीन एक निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था है. इस वक़्त न तो वो यूरोप को निर्यात कर पा रहा है और न ही अमेरिका को. चीन के लिए मार्केट तलाशना बहुत ज़रूरी है और भारत एक अच्छा विकल्प हो सकता है. हमारी घरेलू खपत अच्छी है जबकि चीन की घरेलू खपत बहुत कम है."

प्रोफ़ेसर श्रीपर्णा पाठक का मानना है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इस तरह से तनाव आता है तो कुछ न कुछ नया तरीक़ा निकल आता है. भारत के लिए शायद यह वही मौक़ा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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